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**18 साल के किशोर ने हाईकोर्ट में खुद की पैरवी, सीजे हुए मुरीद – सभी एफआईआर निरस्त**

**18 साल के किशोर ने हाईकोर्ट में खुद की पैरवी, सीजे हुए मुरीद – सभी एफआईआर निरस्त**

बिलासपुर।
सिर्फ 18 साल की उम्र और हाईकोर्ट की बार में खुद अपनी प्रभावशाली पैरवी। यह नजारा देखकर खुद चीफ जस्टिस भी दंग रह गए। साइबर क्राइम में केवल आईपी एड्रेस के आधार पर फंसाए गए किशोर पीयूष गंगवानी ने हाईकोर्ट में दाखिल अपनी याचिकाओं पर खुद बहस की और डिवीजन बेंच से बड़ी राहत हासिल की। कोर्ट ने उसके खिलाफ दर्ज दोनों एफआईआर को निरस्त कर दिया।

**जाली दस्तावेजों से फंसाने का आरोप**
गंगवानी ने चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस विभु दत्त गुरु की डीबी में तर्क दिया कि पुलिस अधिकारियों और निजी प्रतिवादी डी. भास्कर राव की मिलीभगत से जाली दस्तावेज और हस्ताक्षर तैयार कर उसे झूठे मामलों में फंसाया गया। उसने बताया कि न तो उसके डिवाइस से कोई फर्जी इंस्टाग्राम अकाउंट ऑपरेट हुआ और न ही वह कथित अपराध में शामिल रहा।

**साइबर रिपोर्ट बनी बड़ी ताकत**
साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत प्रस्तुत साइबर सेल की रिपोर्ट ने भी इस तथ्य की पुष्टि की कि याचिकाकर्ता के डिवाइस का इस्तेमाल आपत्तिजनक अकाउंट चलाने के लिए नहीं किया गया। कोर्ट ने साफ कहा कि इस स्थिति में आपराधिक कार्रवाई जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

**झूठे आरोपों का सिलसिला**
गंगवानी का नाम सह-अभियुक्त क्षितिज भारद्वाज के कथन पर बिना साक्ष्य के दर्ज किया गया था। वहीं दूसरी एफआईआर में भी सिर्फ एक कथित आईपी एड्रेस के आधार पर उसे आरोपी बना दिया गया। यहां तक कि थाने में जबरन कागजों पर हस्ताक्षर कराकर कोर्ट में पेश कर दिया गया।

**प्रथम दृष्टया दुर्भावनापूर्ण अभियोजन**
डीबी ने माना कि यह पूरा मामला *दुर्भावनापूर्ण अभियोजन, कष्टदायक कार्यवाही और प्रक्रियागत अनियमितताओं* से भरा हुआ है। कोर्ट ने कहा कि किशोर के खिलाफ दर्ज दोनों एफआईआर और कार्रवाई निरस्त की जाती है, हालांकि सह-अभियुक्तों पर कानूनन कार्रवाई जारी रहेगी।

*न्यायालय के इस फैसले ने यह साबित कर दिया कि यदि हिम्मत और सच्चाई साथ हो, तो 18 साल का युवा भी खुद अपनी पैरवी कर न्याय की लड़ाई जीत सकता है।**

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