**जिला कांग्रेस की डगमग सियासत: नेतृत्व से लेकर गुटबाज़ी तक, कांग्रेस की हालत चिंताजनक**
*(संजीव सिंह, विशेष राजनीतिक विश्लेषण)*
बिलासपुर की जिला ग्रामीण कांग्रेस की कमान इस समय ऐसे नेता के हाथ में है, जिन्होंने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत युवक कांग्रेस से की थी। शुरुआती दौर में वे मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता डॉ. चरणदास महंत के करीबी रहे, लेकिन 2001 में सत्ता परिवर्तन की बयार आते ही उन्होंने महंत का साथ छोड़कर तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी की शरण ले ली। राजनीतिक समझ और संघर्ष से ज्यादा उनका झुकाव क्रिकेट के मैदान की ओर ज्यादा रहा। यही कारण रहा कि भारतीय जनता पार्टी शासनकाल में वे अमर-अकबर के पिता के नाम पर ट्रॉफी का आयोजन करते रहे और यहीं से सत्ता के समीकरणों में उन्हें स्थान मिला।
दलीय निष्ठा और विचारधारा से ज्यादा अवसरवादिता की नीति ने उन्हें जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद तक पहुंचाया। पिछले सात वर्षों से वे इस पद पर काबिज हैं, लेकिन इन वर्षों में कांग्रेस का विस्तार नहीं, बल्कि लगातार पतन ही देखा गया। नाम “विजय” रख लेने से पार्टी को जीत हासिल नहीं होती — लेकिन यह सच्चाई न तो प्रदेश अध्यक्ष समझ रहे हैं और न ही राष्ट्रीय नेतृत्व इसे स्वीकार करना चाहता है।
अब जबकि छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव में तकरीबन तीन साल का समय बचा है और संभावित परिसीमन की अटकलें तेज हैं, कांग्रेस के भीतर गुटबाज़ी फिर से सिर उठाने लगी है। बिलासपुर की राजनीति में कांग्रेस दो गुटों में बटी हुई दिख रही है — एक ओर पूर्व विधायक शैलेश पांडे, अटल श्रीवास्तव और नसरुद्दीन (छोटे )का गठजोड़, तो दूसरी ओर उनसे इतर खेमेबाजी। अटल श्रीवास्तव की पूरी कोशिश है कि शैलेश पांडे को शहर कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जाए, लेकिन इसमें रोड़ा बन सकते हैं उनके पूर्व राजनीतिक गुरु टी.एस. सिंहदेव।
इधर, जिला ग्रामीण कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए प्रेमचंद जायसी का नाम चर्चा में है, लेकिन उनकी नियुक्ति भी दो बड़े कारणों से रुकी हुई है — पहला, प्रदेश प्रभारी का संभावित बदलाव और दूसरा, प्रदेश अध्यक्ष को हटाए जाने की अटकलें। सूत्रों की मानें तो प्रदेश प्रभारी बदलने के बाद ही नए जिला अध्यक्ष की नियुक्ति को हरी झंडी मिल पाएगी, जबकि भुगतान जैसे जरूरी औपचारिक पक्ष पहले ही पूरे हो चुके हैं।
बिलासपुर कांग्रेस की दुर्दशा सिर्फ नेतृत्व की कमजोरी तक सीमित नहीं है। कार्यकर्ताओं में न उत्साह बचा है, न ही एकजुटता। जो नाम सामने आ रहे हैं, उनमें वह क्षमता नहीं दिखती कि वे सड़क पर उतरकर आंदोलन का नेतृत्व कर सकें और कांग्रेस को पुनर्जीवित कर सकें। पार्टी संगठन जमीनी मुद्दों से कट चुका है और जनता से संवाद लगभग समाप्त हो चुका है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय केसरवानी की राजनीति मूलतः उनके औद्योगिक हितों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। उन्होंने SECL के खिलाफ कई बार आंदोलन किए, लेकिन इसका कारण संगठनात्मक या जनहित नहीं, बल्कि आर्थिक हित थे। जब तक उनकी फैक्ट्री का उत्पाद SECL द्वारा नहीं खरीदा जा रहा था, तब तक वे आंदोलन करते रहे। और जैसे ही कारोबार शुरू हुआ, उनके विरोध की तीव्रता एकदम ठंडी हो गई। जो नेता राजनीति को अपने व्यावसायिक हितों का उपकरण बना लेता है, वह संगठन के लिए कितना उपयोगी होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
MIC (नगर निगम समिति) में भी उन्होंने अपनों की अनदेखी कर स्वयं को काबिज किया और बाद में विधानसभा टिकट किस तरह प्राप्त किया, यह कांग्रेस के भीतर सभी जानते हैं। उस समय के महापौर राम सरण यादव ने जब इस मुद्दे को सार्वजनिक किया, तो पार्टी ने उन्हें ही कुछ समय के लिए निलंबित कर दिया — यह बताने के लिए काफी है कि सत्तासीन नेता किस हद तक पहुंच चुके हैं।
कुल मिलाकर, बिलासपुर कांग्रेस आज जिस स्थिति में खड़ी है, वह संगठनात्मक जर्जरता, नेतृत्व की कमजोरी और गुटबाज़ी की पराकाष्ठा का परिणाम है। यदि पार्टी आलाकमान ने जल्द ही सख्त निर्णय नहीं लिए, तो आगामी चुनावों में बिलासपुर की कांग्रेस अपनी राजनीतिक पहचान बचाए रखने के लिए ही संघर्ष करती नजर आएगी।
Sanjeev singh Address bhartiya nagar bilaspur 7000103836

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