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पुलिस कार्रवाई में भेदभाव का आरोप: दो मामलों में कार्यवाही की गति पर उठे सवाल**

**पुलिस कार्रवाई में भेदभाव का आरोप: दो मामलों में कार्यवाही की गति पर उठे सवाल**

**बिलासपुर, 11 जून 2025।** रायपुर जिले के तिल्दा थाना क्षेत्र अंतर्गत थोमा चर्च के पास्टर सेमसंग सेमुएल (63 वर्ष) ने छत्तीसगढ़ डायोसिस की विशप सुषमा कुमार, पादरी परमिंदर, डायोसिस के अवैधानिक सचिव नितिन लॉरेंस, जयदीप रॉबिंसन सहित अन्य के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने बताया कि उक्त आरोपी 15 मई व 1 जून को उनके आवास में अवैधानिक रूप से हथियारों सहित घुसे और धार्मिक समूह को भड़काने की कोशिश की। दोनों घटनाओं के लिए उन्होंने पृथक शिकायतें दीं, परंतु थाने में सिर्फ एक एफआईआर 1 जून को दर्ज की गई है। पुलिस ने धारा 191(2), 296, 324(4), 351(2) के तहत मामला दर्ज किया है, लेकिन अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई।

पास्टर सेमुएल का कहना है कि अपराधियों में पुलिस का कोई खौफ नहीं रहा। आरोपियों के खुलेआम घूमने से पीड़ित पक्ष की सुरक्षा और न्याय प्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस जानबूझकर मामले को लटकाए हुए है।

इसी बीच डायोसिस के ही अवैधानिक सचिव नितिन लॉरेंस की शिकायत पर पुलिस ने पूरी तरह अलग रवैया अपनाया। नितिन ने 11-12 फरवरी को बर्जेस स्कूल परिसर में सुबोध मर्टिन द्वारा धमकी व पैसों की मांग का आरोप लगाया था। 17 फरवरी को पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत दी गई और अगले ही दिन 18 फरवरी को बिना एफआईआर के पहले यशराज सिंह व बिनु बैनेट को रायपुर से हिरासत में ले लिया गया। फिर उसी दिन 15:05 बजे एफआईआर दर्ज कर 308(2), 35 बीएनएस के तहत आरोपियों को न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया गया।

इतना ही नहीं, नितिन लॉरेंस स्वयं सिविल लाइन थाना रायपुर में संज्ञेय अपराध के आरोपी हैं, और एडिशनल एसपी के निर्देश के बावजूद उनके विरुद्ध एक वर्ष तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। अंततः शिकायतकर्ता को हाईकोर्ट जाना पड़ा, जहां से सीजेएम रायपुर के माध्यम से प्रकरण दाखिल हुआ। न्यायालय ने थाना प्रभारी से प्रतिवेदन भी मांगा है।

इन दो मामलों में पुलिस की भिन्न-भिन्न कार्यवाही, एक में त्वरित एफआईआर और गिरफ्तारी, जबकि दूसरे में एक माह की चुप्पी, कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है। क्या कानून का पालन व्यक्ति की पहचान पर आधारित हो गया है? भारतीय संविधान समानता की गारंटी देता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

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