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हाई कोर्ट का स्वत: संज्ञान–क्या जिला प्रशासन की कार्यशैली में गहरी लापरवाही का सबूत?*

**हाई कोर्ट का स्वत: संज्ञान– क्या जिला प्रशासन की कार्यशैली में गहरी लापरवाही का सबूत?**

बिलासपुर।
हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने लगातार कई मामलों में स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए जिला प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया है। कभी कानून-व्यवस्था को लेकर, कभी सार्वजनिक सुविधाओं की बदहाली पर, तो कभी संवेदनशील मामलों में प्रशासनिक उदासीनता को देखते हुए अदालत को स्वयं दखल देना पड़ा। यह स्थिति गंभीर सवाल खड़े करती है कि आखिर जिले के जिम्मेदार अधिकारी और प्रशासनिक तंत्र अपनी मूल जिम्मेदारियों के निर्वहन में क्यों चूक रहे हैं।

न्यायालय का स्वत: संज्ञान लेना साधारण बात नहीं है। यह तभी होता है जब अदालत को लगे कि सार्वजनिक हित, मौलिक अधिकार या प्रशासनिक जवाबदेही पर सीधा खतरा है और संबंधित जिम्मेदार विभाग स्थिति सुधारने में असफल हो रहा है। बिलासपुर हाई कोर्ट ने हाल के महीनों में सड़कों की बदहाली, अस्पतालों की लापरवाह व्यवस्था, प्रदूषण, अवैध कब्जों से लेकर अपराध नियंत्रण जैसे मामलों पर प्रशासन से कड़े सवाल पूछे। इसका सीधा संकेत यही है कि प्रशासनिक मशीनरी जनता की अपेक्षाओं और अपने संवैधानिक दायित्वों को निभाने में कहीं न कहीं नाकाम हो रही है।

कानून विशेषज्ञों का मानना है कि स्वत: संज्ञान न्यायालय का “आपात हस्तक्षेप” है। जब सरकार और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटते हैं, तब न्यायपालिका मजबूर होकर जनता के हक में आगे आती है। लेकिन अगर यह क्रम बार-बार दोहराया जाए तो यह लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चिंता का विषय बन जाता है। न्यायपालिका का काम कानून की व्याख्या करना है, न कि रोज़मर्रा के प्रशासनिक कामकाज संभालना। यदि अदालत को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़े तो यह जिला प्रशासन की अक्षमता और उदासीनता का आईना है।

जनता के बीच भी यही चर्चा है कि क्या जिला प्रशासन अब केवल कागज़ी कार्रवाई तक सीमित हो गया है? धरातल पर समस्याओं के समाधान की जगह फाइलों और बैठकों में समय जाया करना उनकी आदत बन चुकी है। चाहे स्वास्थ्य सेवाएं हों या नगर निगम की व्यवस्था, पुलिसिंग हो या सामाजिक सुरक्षा योजनाएं—अदालत की फटकार के बाद ही सक्रियता दिखाना अब आम बात हो गई है।

दरअसल, प्रशासन की यह ढिलाई जनता के लिए दोहरी मार साबित हो रही है। एक ओर बुनियादी सुविधाओं की कमी से लोग परेशान हैं, दूसरी ओर उन्हें न्याय के लिए अदालत की चौखट तक पहुंचना पड़ता है। जबकि यदि प्रशासन अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाए तो न जनता को कोर्ट की शरण में जाना पड़े और न ही हाई कोर्ट को स्वत: संज्ञान लेने की नौबत आए।

हाई कोर्ट की हालिया टिप्पणियां एक साफ संदेश देती हैं कि जिला प्रशासन अपनी प्राथमिक जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकता। उसे जनता के प्रति जवाबदेह होना ही पड़ेगा। न्यायालय का स्वत: संज्ञान जिला प्रशासन के लिए चेतावनी की घंटी है—यदि अब भी लापरवाही जारी रही तो न सिर्फ साख गिरेगी बल्कि कठोर कानूनी कार्रवाई की संभावना भी बढ़ेगी।

हाई कोर्ट का लगातार स्वत: संज्ञान लेना केवल प्रशासनिक लापरवाही का संकेत नहीं, बल्कि यह जिला प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवालिया निशान है। अब समय आ गया है कि प्रशासन आत्ममंथन करे, सिस्टम में जवाबदेही लाए और जनता की समस्याओं का समाधान प्राथमिकता से करे। वरना न्यायपालिका का यह हस्तक्षेप प्रशासन की साख और जनता के विश्वास दोनों को डगमगा देगा।

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